विधानसभा में पहली बार राजभाषा दिवस पर छत्तीसगढ़ी में हुई पूरी कार्यवाही

  29/11/2019


छत्तीसगढ़ विधानसभा के शीतकालीन सत्र के चौथे दिन सदन की पूरी कार्यवाही छत्तीसगढ़ी भाषा में हुई। स्पीकर डा. चरणदास महंत ने कार्यवाही शुरू होते ही कहा कि आज राजभाषा दिवस हैआज ही के दिन 2007 में विधानसभा में छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बनाने का रास्ता साफ हुआ था। यह प्रसन्नता की बात है, इसलिए मैं अनुरोध करता हूं कि सभी सदस्य अपनी बात छत्तीसगढ़ी भाषा में रखें। 

सदन में कुछ इस अंदाज में हुई चर्चा-

अध्यक्ष चरणदास महंत बोले- सबो झन ध्यान रखव, लमा-लमाके बात झन करव

प्रश्नकाल मं जब खाद्यमंत्री अमरजीत भगत ह धान खरीदी के सवाल के जवाब देवत रिहिस त स्पीकर महंत ह आेला टोकत हुए किहिस के अतिक लमा-लमाके उत्तर झन दे (उत्तर को लंबा न करें)। तें लमाबे, तहान एमन लमाही अउ समय खराब होही। तेहं ठुकु (संक्षिप्त) म अपन बात ल रख। भगत फेर उत्तर दे बर सुरु करिस तहांन भाजपा विधायक अजय चंद्राकर पूछिस कि किसान मन ल धान के कतका पइसा मिलही, भगत बताइस कि किसान मन ल हर हाल म 25 सौ रुपया मिलही। अजय बोलिस कि लिखित उत्तर मं ये कहां लिखाय हे, किसान मन ल ठगे के काम करत हो, कब बबा मरही त कब बरा खाबो। अतिके बेर नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक बोलिस कि नि दे सकव त किसान मन ले हाथ जोड़के माफी मांग लेव,काबर कि पहलि बनाए सराब के कमेटी के काय होइस सब जानत हें। शिवरतन शर्मा ह बाेलिस के किसान मन के घेंच (गला) काटे के काम सरकार ह करत हे। इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह ह धान के रकबा कम करे के आरोप लगाके बोलिस के किसान मन ल चोर मत समझो, बेइमान मत समझो काबर कि किसान बोना जानथे त लूये बर घलो जानथे। अतिक घमंड, अतिक मद म नई रहना चाही, सबके घमंड ल उतारे के काम किसान मन अच्छा ले जानथें। तभे संसदीय कार्यमंत्री रविन्द्र चौबे बोलिस कि डा. साहब बोलत रिहिस कि किसान मन बोये ल जानथे त काटे बर घलो जानथे, ला त हमन सामने म देखत हन। एकर बाद सदन म सबो झन जोरदार हांसिन। फेर रमन सिंह किहिस कि हमन स्वीकार करत हन तभे तो कहात हन। सवाल-जवाब के बीच-बीच में उठ के बोले के कोसिस करत पुन्नूलाल मोहले ल महंत दू-तीन बेर किहिस बइठ न बबा...इही समय जब अजय चंद्राकर अपन बात ल हिंदी म बोलत रिसिह त खाद्य मंत्री अमरजीत भगत आेला छत्तीसगढ़ी म बोले बर किहिस त चंद्राकर बाेलिस कि मोला चोचला नि करना हे, मोला भंवरा नि खेलना हे, मोला सोंटा नि मरवाना हे... एकर बाद भगत अउ कुंवर सिंह निषाद मन बोलिस के स्पीकर महोदय ह बेवस्था दे हे अउ सदस्य ह अइसन बोलके छत्तीसगढ़िया मन के अपमान करत हे। 

हमर मातृभाखा बर घलो होना चाही मान
जतका मान हमन ला अपन छत्तीसगढ़ महतारी उपर हे ओतके हमर मातृ भासा छत्तीसगढ़ी बर घलो होना चाही। छत्तीसगढ़ी भाखा ला हमन आत्म गउरव संग जोड़के देखबो तभे वो आघू बढ़ही। -भूपेश बघेल, मुख्यमंत्री

छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़िया ऊपर 11 महीना म बहुत काम होय हे
डॉ महंत बोलिस के 11 महीना म भूपेश सरकार छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी आैर छत्तीसगढ़िया मन बर बहुत काम करे हे। महंत ह बिधानसभा सचिव ल घलो किहिस के आज टेबल छत्तीसगढ़ लिखे ल जनइया मन के डियूटी लगादे जेकर से कार्यवाही ह छत्तीसगढ़ी म लिखा जाय।

कामकाज के भाखा नइ बन पाइस छत्तीसगढ़ी: कौशिक
नेता प्रतिपक्ष कौशिक बोलिस के छत्तीसगढ़ी भाखा म एकर स्वीकारोक्ति अभी भी नई हो पाए हे काबर कि अतिक साल म हमन एला कामकाज के भाखा नई बना पाए हन। एकरे कारण एला जे सम्मान आज तक मिल जाना रिहिस नई मिल पाए हे। एकर लिए हम सब झन ल परयास करेके जरूरत हे।

केंद्र ने अब तक आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया, इसलिए अब तक राजभाषा नहीं बन पा रही छत्तीसगढ़ी
केंद्र सरकार ने अब तक छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया, इसलिए राजभाषा नहीं बन पा रही है। आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद सीबीएसई पाठ्यक्रम में छत्तीसगढ़ी को शामिल किया जाएगा। आईएएस-आईपीएस को एकेडमी में छत्तीसगढ़ी की पढ़ाई कराई जाएगी। जिन राज्यों की भाषाएं आठवीं अनुसूची में शामिल है, वहां यह व्यवस्था है। यूपीएससी की परीक्षा भी उसी भाषा में होती है। इसी तरह छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के बाद राज्य में आसानी से छत्तीसगढ़ी को सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में शामिल किया जा सकेगा। फिलहाल यहां छत्तीसगढ़ी हिंदी के बाद अतिरिक्त भाषा है, इसलिए कानूनी तौर पर कामकाज में हिंदी का इस्तेमाल किया जाता है। बता दें कि राजभाषा आयोग ने छत्तीसगढ़ी की डिक्शनरी तैयार कर ली है।

डॉ. सुरेंद्र दुबे ने कहा- आठवीं अनुसूची में आने से खत्म हो जाएगी समस्या
छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के पूर्व सचिव डॉ. सुरेंद्र दुबे के मुताबिक राज्य में राजकाज की भाषा बनाने में कोई समस्या नहीं है। आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं होने के कारण आईएएस-आईपीएस अफसरों की ट्रेनिंग या सीबीएसई पाठ्यक्रम में छत्तीसगढ़ी को शामिल नहीं किया गया है। सांसद यदि केंद्र सरकार पर दबाव बनाएं तो आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा सकता है।













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