पीएचडी के नए-नियम से सीटें और शोधार्थी दोनों घटे

  10/06/2019


प्रदेश के प्रतिष्ठित पंडित रविशंकर शुक्ल विश्‍वविद्यालय (रविवि) समेत सभी विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों की कमी के कारण पीएचडी के लिए इंतजार करने वाले शोधार्थियों की फेहरिस्त लंबी हो गई है। इतना ही नहीं गाइड न मिलने के कारण शोधार्थियों की संख्या भी लगातार घट रही है। दो साल पहले यूजीसी ने गाइडलाइन बदली। इसके अनुसार सहायक प्राध्यापक चार,  सह प्राध्यापक छह और प्राध्यापक आठ शोधार्थियों को पीएचडी करा सकते हैं। इसके पूर्व इन्हें आठ-आठ छात्रों को पीएचडी कराने की अनुमति थी। इनके अलावा सेवानिवृत्त प्रोफेसर भी पीएचडी करा सकते थे,  लेकिन अब वे इस क्राइटेरिया से बाहर हैं। नए नियम से सीटें भी 40 फीसदी कम हो गईं।

नए नियम बनने से बीते दो सालों से पीएचडी करने के इच्छुक छात्रों को सबसे अधिक झटका लगा है। रविवि के कुलसचिव डॉ. गिरीशकांत पाण्डेय के मुताबिक नये शोध केंद्र खुलने और सुपरवाइजर बनने से नये शोधार्थियों को मौका मिलेगा। अभी-अभी दुर्गा कॉलेज के 13 पीएचडी छात्रों को गाइड के अभाव में कोर्स वर्क परीक्षा से वंचित होना पड़ा है। प्रदेश के सबसे पुराने पं. रविशंकर शुक्ल विवि में पीएचडी की 750 से अधिक सीटें हैं। इनमें 50 फीसद सीटें भरी हैं। कुछ छात्र पिछले साल से पीएचडी के लिए इंतजार कर रहे हैं। कमोबेश कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि, पं. सुंदरलाल शर्मा ओपन विवि, बिलासपुर विवि, दुर्ग विवि, सरगुजा व बस्तर विवि में भी यही हालात हैं।

इस साल कुछ नये कॉलेजों में शोध केंद्र खुलने का इंतजार है। इसके लिए आवेदन किए गए हैं। वहीं कुछ सहायक प्राध्यापकों ने पीएचडी कराने की पात्रता के लिए आवेदन किए हैं। इससे उम्मीद की जा रही है कि गाइड की संख्या के साथ शोध केंद्र बढ़ जाएंगे। साल 2016 से 2017 के बीच रविवि में सोशल साइंस के 66, साइंस के 24, आर्ट्स के 31, लाइफ साइंस के 11, एजुकेशन के पांच, कॉमर्स के 27, फिजिकल एजुकेशन के 6, मैनेजमेंट के तीन और टेक्नोलॉजी के दो छात्रों को पीएचडी की उपाधि मिली।













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