8 जून : विश्व महासागर दिवस

  08/06/2019




इस धरती पर सबसे विशाल इकाई है महासागर। पूरे ग्लोब पर 70 प्रतिशत हक़ के साथ सागरों का साम्राज्य है। अगर आपने  कभी सागर ना देखा हो तब भी महासागरों से आपके जीवन का गहरा रिश्ता है। कैसे? वो ऐसे कि महासागर जीव-जंतुओं और मानव जीवन के लिए पर्यावरण तंत्र में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।
•    हमारे द्वारा ग्रहण की जाने वाली ऑक्सिजन का सबसे बड़ा हिस्सा बनाते हैं
•    मानव जीवन के लिये भोजन प्रदान करते हैं
•    हमारी जलवायु को नियंत्रित करते हैं
•    हमारे लिये पानी को साफ़ करते हैं
•    औषधियों में प्रयुक्त होने वाली वनस्पतियों का निर्माण करते हैं
 और बदले में इन महान सागरों को हम क्या दे रहें हैं... ?
हम इन्सानों ने जलवायु, पर्यावरण और महासागरों को बेहद गंभीर नुकसान पहुंचाया है। वर्ल्ड ओशन नेटवर्क के आकड़ों के हिसाब से...
•    महासागरों में 80% गंदगी ज़मीनी श्रोतों से आती है
•    कई विकासशील देशों में 90% गंदा पानी और 70% औद्योगिक कचरा बिना उपचार के सागरों में पहुँचता है
•    प्रति वर्ष 6.5 मिलियन टन कचरा दुनियाँ के महासागरों में आता है जिसमें से 50% प्रतिशत प्लास्टिक होता है।
•    व्यावसायिक रूप से 1,00,000 रसायन बनाए जाते है जिनके सागरों में मिल जाने का खतरा बना रहता है
•    हमारी जानकारी में महासागरों में 200 से अधिक “डेड ज़ोन” हैं जहां के पानी में ऑक्सिजन न होने के कारण ये हिस्से जीवन-रहित हैं
•    हर साल 1,00,000 से अधिक समुद्री जीव-जन्तु प्लास्टिक कचरे के कारण मारे जाते हैं 
मुझे समंदरों से बेहद लगाव है। हर वर्ष होली की छुट्टियाँ विशाखापट्नम या जगन्नाथ पुरी में परिवार के साथ समुद्र की विशालता निहारते हुए बिताता हूँ। बड़ा अफ़सोस होता है देखकर कि लोग किस तरह से प्रकृति को दूषित करने को “एंजॉयमेंट” का नाम देते हैं। प्रकृति के साथ एक समस्या है। समस्या यह कि वो तुरंत “रिएक्ट” नहीं करती। किसी फल का बीज आज लगाएंगे तो 10 साल बाद पेड़ तैयार होगा। 15 साल बाद फल मिलेंगे। वैसे ही, हम “विवेकी मानव” अपने महासागरों के साथ जो ज़्यादतियाँ कर रहे हैं वे लंबे समय के बाद बेहद भयावह परिणाम बनकर हमारे सामने खड़ी होंगी।
मुझे लगता है कि हम हिंदुस्तानियों का प्रकृति के प्रति दायित्व औरों के मुक़ाबले कुछ ज़्यादा होना चाहिए। लेकिन कभी-कभी मुझे शक होता है अपनी दोमुंही भावनाओं और तथाकथित धार्मिकता को ले कर। एक तरफ़ हम धरती को माँ कहते हैं और उसे नुकसान पंहुचाने में रत्ती भर भी नहीं हिचकते। महासागरों में दुनियाभर की गंदगी उड़ेलते हुए हम यह क्यूँ भूल जाते हैं कि इन्हीं महासागरों के मंथन से देवताओं को बहुमूल्य धरोहरें प्राप्त हुई थी। अमृत भी मिला था और विष भी मिला था। मेरा दावा है कि अगर आज हम सागर का मंथन करें तो सिर्फ़ और सिर्फ़ विष मिलेगा... ढेर सारा विष। इस बार शिवजी हमारी सहायता के लिए नहीं आएंगे। यह विष, पूरा विष, मात्र मानव जाति को ही पीना पड़ेगा।













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