4 जून : इंटरनेशनल डे ऑफ इनोसेंट चिल्ड्रेन विक्टिम ऑफ एग्रेशन

  04/06/2019




हमने अगर युद्ध नहीं देखा तो यह हमारी खुशकिस्मती है क्योंकि युद्ध की भयावहता का अनुमान लगा पाना किसी कवि, कहानीकार या फ़िल्मकार के बस की बात नहीं है क्योंकि युद्ध का तूफ़ान शब्दों में समेट पाना असंभव है।  मुहल्ले में चली चुकी गोली की अफ़वाह हमें इतना दहला देती है और हम अपने बच्चों के प्रति कितने चिंतित हो जाते हैं  तो सोचिये आस-पास से गुजरती गोलियों और तोप के गोलों के सैलाब का मंज़र कैसा होगा? लेकिन इसे समझ पाने के लिए एक संवेदनशील आत्मा की ज़रूरत है। घर में जब कभी बरसात का पानी घुस आता है तो हमें अपने बच्चों का किस तरह ध्यान रखने की ज़रूरत पड़ती है। जब कभी बच्चे बीमार पड़ते हैं तो सारा काम-धाम छोड़ कर हमारी प्राथमिकता बच्चे की देखभाल बन जाती है।

ऐसे हालात में हम क़ाबिल होते है कि हम बच्चों का सहारा बन सकें लेकिन युद्ध बेहद गैर-संवेदनशील होता है। वह ज़्यादातर लोगों को इस क़ाबिल ही नहीं छोड़ता कि वे अपने बच्चों का खयाल रख सकें और ऐसे हालात में बच्चे ईश्वर के भरोसे रह जाते हैं।
“बच्चों को हमेशा शांति और सुरक्षा की ज़रूरत है। युद्ध के नियमों में यह बातें शामिल हैं कि आम जनता, शालाओं व अस्पतालों को लक्ष्य ना बनाया जाए, बच्चों का इस्तेमाल और गैर-कानूनी बंधक ना बनाया जाए और मानवता के नाते मदद से इन्कार नहीं किया जा सकता। जब कभी संघर्ष बढ़ता है तो इन नियमों का पालन किया जाना चाहिए और जो कोई इन नियमों को अनदेखा करता है उसे जिम्मेदार ठहरना ज़रूरी है। अब हद हो चुकी है... बच्चों पर हमले बंद करो”। उपरोक्त बातें यूनिसेफ़ की एक्जेक्यूटिव डायरेक्टर हेनरिटा फोर ने किन संदर्भों में कही हैं ये बड़ी आसानी से समझा जा सकता है।
ग्रेसा माशेल द्वारा लिखित एक रिपोर्ट “Impact of Armed Conflict on Children”, जिसमे युद्ध से पीड़ित बच्चों के हालातों का वर्णन किया गया था, के आधार पर वर्ष 1997 में संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल असेंबली में बच्चों के अधिकारों से संबंधित नियम 51/77 को लागू किया।

इन नियमों से युद्ध में बच्चों के प्रति होने वाली हिंसक और गैर-मानवतावादी हरकतें करने वालों के खिलाफ़ कड़े प्रावधान बनाए गए हैं। लेकिन युद्ध के दौरान कितनों में कितनी मानवता बची रह जाती है यह पता कर पाना संभव नहीं है।  


समझदार माता-पिता अपने बच्चों को भयावह फ़िल्में या विचलित करने वाले दृश्य नहीं देखने देते क्योंकि वे इस बात को समझते हैं कि इससे बच्चे के कोमल मन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। दूसरी तरफ आपने युद्ध से पीड़ित बच्चों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर ज़रूर देखी होंगी... जो अपनी कहानी खुद कहती हैं। आइये युद्ध और बच्चों से संबन्धित यूनिसेफ़ के सर्वे से मिले कुछ डाटा-दृश्यों पर नज़र डालते हैं।


•    सराजेवो, बोस्निया और हेरज़ेगोविना में 55% बच्चों पर गोलियां चली, 66% बच्चे मरणासन्न अवस्था तक पहुँच गए और 29% इस असहनीय हालत में तड़पते रह गए।
•    अंगोला में 66% बच्चों ने लोगों का क़त्ल होते हुए देखा, 67% बच्चों ने लोगों का टार्चर होते हुए या मार खाते हुए देखा।
•    रवांडा में 56% बच्चों ने लोगों को क़त्ल करते हुए देखा, 80% बच्चों ने अपने परिवारजनों को खो दिया, 16% बच्चों को अपनी जान बचाने के लिए मजबूरन लाशों के नीचे छुपना पड़ा। इन हालातों से बच्चों में जीवन के प्रति नकारात्मक भावनाएं पैदा हुई। रवांडा में लिए इंटरव्यू के दौरान 60% बच्चों ने कहा कि उन्हें परवाह नहीं है वे बड़े होंगे या नहीं।  
जीवन के प्रति इस तरह की घोर निराशा यदि हमारे बच्चों में घर कर जाए तो हम क्या करेंगे?  ईश्वर ना करे कभी हमारे बच्चों को युद्ध की भयावह स्थिति से गुज़रना पड़े तो...? हम यह सोच कर ही दहल जाते हैं... लेकिन एक नौ साल की लिबेरियन बच्ची ने जो घटनाएँ सुनाई उसके बगैर यह लेख ख़त्म नहीं हो सकता...
“मैंने 10 – 20 लोगों को गोलियों से मरते हुए देखा, उनमे से ज़्यादातर बुज़ुर्ग थे जो तेज़ नहीं चल सकते थे। फिर उन्होने मेरे अंकल को सिर में गोली मारी और फिर मेरे पिता को कहा कि वो अंकल का निकला हुआ भेजा उठाकर पानी में फेंक दें। फिर मेरे पिता को नंगा होने और एक सड़ती हुई लाश से संबंध बनाने को मज़बूर किया। उसके बाद उन लोगों ने मेरी 9 साल की चचेरी बहन से बलात्कार किया”।
अगर आपको यह लेख विचलित कर रहा है तो मुबारक हो कि आप भी ज़िंदा हैं।  अब तो शब्द भी विचलित हो रहे हैं और डूब मारना चाहते हैं ...  बस सोचना यह है की युद्ध कितना ज़रूरी होता है? युद्ध कौन जीतता या हारता है? युद्ध की गंदगी को सबसे ज़्यादा कौन भुगतता है? आप किस ओर खड़ें हैं ? युद्ध की वकालत में या शांति के प्रसार में? 
Source: https://www.unicef.org/graca
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