मेरे पिया गए रंगून से कजरा मोहब्बत वाला तक, शमशाद बेगम का हर नग़मे पर मन नाचता है

  14/04/2019




शमशाद बेगम ये नाम आज का संगीत सुनने वालों के लिए अनजाना ही है। जाना हुआ हो भी तो कैसे ? आजकल पुराने गानों का मतलब साठ और सत्तर के दशक के गीतों से रह गया है। हद से हद पचास के दशक के गीत आप विविध भारती सरीखे सरकारी चैनलों पर सुन पाते हैं। पर जो गायिका चालिस और पचास के दशक में अपने कैरियर के सर्वोच्च शिखर पर हो उसके गीतों की झंकार आज कहाँ सुनाई देगी? अगर पिछले दशक में शमशाद बेगम का जिक़्र आया भी तो वो उनके गाए गीतों के रिमिक्स वर्जन की वज़ह से या फिर उनकी मौत की गलत अफ़वाह की वजह से। आज जब वो हमारे बीच नहीं है आइए एक नज़र डालें शमशाद आपा के सांगीतिक सफ़र पर उनके उन पाँच गीतों के साथ जिनको सुन सुन कर हम बड़े हुए और जिनकी तरावट हम आज भी गाहे बगाहे अपने होठों पर महसूस करते रहते हैं।


1919 में पश्चिमी पंजाब के लाहौर में जन्मी शमशाद बेगम लाहौर रेडियो पर भक्ति गीत गाया करती थीं। जब वो अठारह वर्ष की थीं तब उनकी आवाज़ से प्रभावित होकर सबसे पहले पंजाबी फिल्मों के निर्देशक गुलाम हैदर ने उन्हें मौका दिया। 1941 में आई फिल्म 'ख़जाना' बतौर गायिका उनकी पहली हिंदी फिल्म थी। चालिस के उत्तरार्ध में उन्होंने अपनी समकक्ष गायिकाओं ज़ोहराबाई व अमीरबाई को पीछे छोड़ दिया। हालात ये हो गए कि उन्हें तब एक गीत गाने के लिए हजार रुपये दिए जाने लगे। आज से साठ साल पहले हजार रुपये की कीमत क्या रही होगी इसका आप सहज अंदाज़ा लगा सकते हैं। शमशाद बेगम को लोकप्रियता की सीढ़ियाँ चढ़ाने में संगीतकार नौशाद साहब का काफी हाथ रहा।

नौशाद के लिए गाए उनके गीत चाँदनी आई बनके प्यार, बादल आया झूम के, धरती को आकाश पुकारे काफी लोकप्रिय हुए। पर 1950 में फिल्म 'बाबुल' के बाद नौशाद ने बतौर मुख्य गायिका शमशाद के ऊपर लता मंगेशकर को तरज़ीह देनी शुरु कर दी। शमशाद की आवाज़ में ना तो लता की मधुरता थी और ना ही उन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखा था। इन सीमाओं के बावज़ूद उनकी आवाज़ में खनक के साथ एक सादगी थी। यही सादगी उन्हें आम आदमी की आवाज़ बना देती थी।

पचास के दशक में नौशाद से साथ छूटा पर एस डी बर्मन, सी रामचन्द्र और ओ पी नैयर जैसे संगीतकारों से शमशाद को काम मिलता रहा। पचास के दशक के इन्हीं गीतों को सुनना और गुनगुनाना मुझे बेहद पसंद रहा है। तो आइए सुनिए मेरी पसंद का पहला नग्मा जिसके बोल लिखे थे राजेंद्र कृष्ण ने और धुन बनाई थी एस डी बर्मन साहब ने। 1951 में आई फिल्म 'बहार' के इस गीत की इन पंक्तियों को कौन भूल सकता है  सैंया दिल में आना रे, आ के फिर ना जाना रे छम छमाछम छम..

राजेंद्र कृष्ण का ही लिखा हुआ एक और मजेदार युगल गीत था फिल्म 'पतंगा' (1949) का। मेरी समझ से रंगून को बहादुरशाह जफ़र के बाद किसी गीत ने मशहूर बनाया था तो वो इसी गीत ने :)। मेरे पिया गए रंगून को संगीतबद्ध करने वाले थे सी रामचन्द्र। वही रामचन्द्र जिन्हें शमशाद बेगम से हिन्दी फिल्मों का पहला पश्चिमी शैली में संगीतबद्ध किया गीत आना मेरी जान संडे के संडे   गवाने का श्रेय दिया जाता है।

ओ पी नैयर से लता की अनबन के बारे में तो सब जानते ही हैं। पचास के दशक में इसका फायदा शमशाद बेगम को मिला। ओ पी नैयर के लिए 1954 में आई फिल्म आर पार के लिया शमशाद जी का गीत कभी आर कभी पार लागा तीर ए नज़र........ और

1956 में CID के लिए गाया गीत कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना... खूब लोकप्रिय हुए। शमशाद बेगम की आवाज़ की शोखी इन गीतों में सिर चढ़कर बोली।  पर पचास के दशक में जहाँ लता मदनमोहन, नौशाद व सी रामचन्द्र की आवाज़ बन बैठी थीं। वहीं ओ पी नैयर भी अपने गीतों के लिए आशा जी और गीता दत्त को प्रश्रय देने लगे थे।

इस दौरान नौशाद ने युगल गीतों में शमशाद बेगम को मौका जरूर दिया पर उन गीतों में लता ही मुख्य गायिका रहीं। मुगले आज़म की इस कव्वाली (तेरी महफिल में..) में मधुबाला वाला हिस्सा लता के हाथ आया और निगार सुल्ताना वाला शमशाद के। साठ के दशक में शमशाद बेगम ये समझ चुकी थीं कि लता की गायिकी के सामने उनकी आवाज़ को मौके देने वाले कम ही बचे हैं। 1968 में उनका आशा जी के साथ फिल्म 'किस्मत' के लिए गाया युगल गीत कज़रा मोहब्बत वाला ....उनका आखिरी लोकप्रिय गीत था।

शमशाद बेगम ने परिवार वालों की इच्छा के विरुद्ध पन्द्रह साल की उम्र में वकील गणपत लाल से शादी की थी। पिता ने इस शर्त पर उनका गाना गाना कुबूल किया कि वो कभी बेपर्दा हो कर नहीं रहेंगी। यही वजह कि शादी के बाद अपनी गायिकी के तीन दशकों के सफ़र में उन्होंने कभी फोटो नहीं खिंचवाई। पर इसमें कोई शक़ नहीं कि उनके गाए इन अमर गीतों की बदौलत उनकी आवाज़ का चित्र हमेशा हमारे हृदयपटल पर अंकित रहेगा ।

आम तौर पर हिंदी फिल्मों में महिला गायन की स्मृति इस हद तक लता मंगेशकर और आशा भोसले पर आश्रित रही है कि बाकी सारी आवाज़ें जैसे नेपथ्य में चली जाती हैं। हिंदी फिल्मों के सारे पुराने गाने या तो लता मंगेशकर के गाए मान लिए जाते हैं या फिर आशा भोसले के। सुमन कल्याणपुरे से लेकर हेमलता और वाणी जयराम तक की आवाज़ों को लोग लता मंगेशकर के खाते में डालते रहे। यही नहीं, जो आवाजें बड़ी आसानी से लता और आशा से अलग पहचानी जा सकती थीं, उन पर भी कई बार इन दोनों कलाकारों की कीर्ति का परदा पड़ा रहा। शमशाद बेगम और गीता दत्त जैसी निहायत अलग और निजी पहचान वाली आवाज़ों को भी इसका  ख़मियाजा भुगतना पड़ा।


शायद इसी का नतीजा है कि ढेर सारे कर्णप्रिय और लोकप्रिय गीत गाने के बावजूद शमशाद बेगम का नाम बहुत सारे लोगों को अपरिचित या बहुत पुराना जान पडता है। 23 अप्रैल को उनके निधन के बाद जब लोगों ने ‘सीआइडी’ से लेकर ‘आरपार’और ‘क़िस्मत’ तक के खनकते-खिलखिलाते गीत सुने, तब उन्हें याद आया कि इस आवाज़ की खुशबू और खनक अपना अलग संसार रचती-बसाती है, उसे लता मंगेशकर और आशा भोसले की गायकी से काफी अलग खड़ा करती है।


कायदे से देखें तो शमशाद बेगम एक पुराने पुल का नाम है– नूरजहां और लता मंगेशकर के बीच की वह कड़ी, जहां खनक और माधुर्य के बीच, इठलाने और मनुहार के बीच, एक बारीक रेखा होती है। यह उदात्त धीर-गंभीर, उदासी के आंगन में टहलती हुई, विरह के गीत गाती हुई. चांद को पुकारती हुई, आत्मलीन नायिका की आवाज़ नहीं है, वह पूरे माहौल को ज़िंदा कर देने वाली एक ध़डकती-फडकती आवाज़ है- उस अल्हड़, ग्रामगंधी बाला की आवाज़, जो अपनी तुर्श-तिरछी कमनीयता में निमंत्रण भी देती थी और चुनौती भी। ‘बूझ मेरा क्या नाम रे’ या ‘गाड़ी वाले गाड़ी धीरे हांक रे’ जैसे गीतों में शमशाद बेगम की आवाज़ में जैसे पूरा गांव बसा दिखाई पड़ता है, पूरी पगडंडी खुलती नज़र आती है।


गायकी के जानकार बताएंगे कि शमशाद बेगम की तरह खुले गले से गाने वाली गायिकाएं कम हुईं। कहते हैं, उन्होंने बहुत छुटपन से गाना शुरू कर दिया था और उन्हें माइक की ऊंचाई तक पहुंचाने के लिए किसी सहारे की ज़रूरत पड़ती थी। लेकिन माइक के सामने आ जाने के बाद वे दूर से भी गाती थीं तो आवाज जैसे सप्तकों के पार जाकर सीधे अपने लक्ष्य तक पहुंचती थी।


कई मायनों में यह बराबरी और आज़ादी की मांग करती आवाज़ थी- ऐसी आवाज़ जो समर्पित नायिकाओं नहीं, विद्रोही प्रतिनायिकाओं को माकूल पड़ती है। वह नायक पर रीझी हुई, उसे मनाती हुई, उसमें डूबी हुई आवाज़ नहीं थी, उसके बिल्कुल बराबरी पर खड़ी, उससे मोहब्बत का इसरार करती, उसे छेड़ती आवाज़ थी। वह एक तरह से नायिका को भी अपने खोल से बाहर आने को मजबूर करती आवाज़ थी। फिल्म ‘मुगले आज़म’ की मशहूर कव्वाली ‘तेरी महफिल में किस्मत आजमा कर हम भी देखेंगे’ में वह अनारकली के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा महत्त्वाकांक्षी और स्वतंत्र बहार की आवाज़ है जो सलीम को मोहब्बत की चुनौती देती है।


इस आवाज का सबसे शोख और अल्हड़ रंग खुलता है फिल्म ‘किस्मत’ के गीत ‘कजरा मोहब्बत वाला’ में, जिसमें आशा भोसले और शमशाद बेगम की जुगलबंदी जैसे दुनिया जीत लेती है।
यह सच है कि फिल्मी गायकी के उस सुनहरे दौर ने हमें ढेर सारी नायाब आवाज़ें दीं। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि उस गायकी के वसंतकाल में सबसे खिले हुए फूल का नाम शमशाद बेगम था। जिस गायकी की धूप बाद में लता और आशा की आवाज़ में अपनी पूरी चमचमाहट के साथ हर तरफ़ खिलती दिखी, उसका उषा काल शमशाद बेगम की आवाज़ में बसता है।
एक दौर ऐसा भी रहा कि शमशाद बेगम की आवाज़ जिसे छू देती थी वह सोना हो जाता था। कहते हैं, साहिर लुधियानवी और मजरूह सुल्तानपुरी के पहले कामयाब गीत शमशाद बेगम ने ही गाए। राज कपूर ने जब पहली फिल्म ‘आग’ बनाई तो शमशाद बेगम की आवाज़ का इस्तेमाल किया। 

साठ के दशक के बाद शमशाद बेगम ने अचानक जैसे गाना छोड़ दिया। उनके बहुत क़रीबी लोगों को ही ये अंदाजा होगा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। यह बात कुछ इसलिए हैरान करती है कि उनका शुरू करना उनके छोड़ने से ज्यादा मुश्किल था। वे एक पाबंदियों वाले परिवार से आई थीं जहां पिता को भी बेटी का खुले में गाना नागवार गुज़रता था। तब उन्होंने सबको मना और समझा लिया, अपने लिए एक सरहद भी खींच ली कि सिर्फ गीत गाएंगी, सामने नहीं आएंगी। लेकिन जब वे अपने शोहरत के चरम पर थीं तभी अचानक जैसे वे मंच से उठकर नेपथ्य में चली गईं। अब यह बताने वाला कोई नहीं बचा है कि उनकी ज़िंदगी में कौऩ सा ऐसा साज़ सहसा टूट गया था कि उन्होंने यह फ़ैसला किया।
बहरहाल, उनके गीत कभी पुराने नहीं पड़े। उनकी आवाज़ में पुरानी मिट्टी की खुशबू, पुराने घरों का सोंधापन बोलता था। उनकी गायकी के हुलास में पनघटों की खिलखिलाहट और त्योहारों के रंग थे। इस छूटते हुए संसार की बहुत मार्मिक निशानियां उनके गीतों में मिलती हैं। लेकिन शमशाद बेगम की आवाज़ में इस स्मृतिजीविता से भी बड़ी एक चीज़ है- एक दुर्लभ शोखी जो खुलेपन का अपना ही भाष्य रचती है।


यह अनायास नहीं है कि जिस दौर में गीतों में दैहिकता का ताप बढ़ रहा है, मांसलता के सौंदर्य को बहुत सपाट और भोंडी प्रदर्शनप्रियता से विस्थापित किया जा रहा है, तब शमशाद बेगम के उन गीतों के रीमिक्स बन रहे हैं जिनकी दुर्लभ शोखी में तन से ज़्यादा मन विहंसता दिखता है। शमशाद बेगम का जाना और उनका गाना दोनों याद दिला रहे हैं कि हमारे संगीत में शोर और सतहीपन दोनों बढ़े हैं, पांव रोक लेने वाली और मन को बांध सकने वाली धुनें और आवाज़ें अब नहीं बची हैं।


आलेख : पी के तिवारी (लेखक एवं पत्रकार)













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